नारी सशक्तीकरण

रश्मिउपाध्याय,शोध छात्रा
भातखण्डेसम-विश्वविद्यालय,
कैसरबाग, लखनऊ

‘‘नारी! तुमकेवल श्रद्धा होविश्वास-रजत-नगपगतलमें,
पीयूष-स्रोतसीबहाकरो जीवन के सुन्दरसमतलमें।।’’

कोई भी समाज या परिवार तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक कि वहां स्त्रियों का सम्मान न हो, हमारी प्राचीन सभ्यता भी यही कहती हैः ‘‘यत्र नार्यस्तुपूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’’अर्थात् जिस परिवार, समाज और राष्ट में स्त्रियों का सम्मान किया जाता है वहीं सुख, शान्ति एवं समृद्धि आती है। इसीलिये नारियों के प्रति भेदभाव और निरादर का त्याग करना अतिआवश्यक है। नारी समाज का ऐसा हिस्सा है जिसके बिना दुनिया का अस्तित्व ही नहीं हो सकता है।

आज, महिलाओं की जीवन शैली में बहुत परिवर्तन हुआ है। पहले वह केवल घर एवं सन्तानों की देखभाल ही करती थी, उसका प्रथम कर्तव्य घर को संभालना एवं सन्तानोत्पत्ति ही था।नारी में अनेक प्रतिभाएं होने के बावजूद, पुरूष प्रधान समाज ने उसको सीमित अधिकार ही दिये थे। पूरी तरह से नारी, पुरूषों पर ही आश्रित थी किन्तु आज की नारी घर से बाहर आ चुकी है और परिवार, समाज एवं राष्ट्र के विकास में स्वयं को पुरूषों से अग्रणी सिद्ध कररहीहैं।

बीसवीं शताब्दी में नारी शिक्षा का अधिकार प्राप्त कर के शिक्षित होती हुई निरन्तर प्रगति के सोपान पर अग्रसर हैं। वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। विश्व में शायद ही केाई कार्य-क्षेत्र बचा हो, जहां महिलाओं ने अपनी कुशलता का परिचय न दिया हो। शिक्षा, साहित्य, चिकित्सा, विज्ञान, न्याय, सेना, पुलिस, उड्डयन, नेवी व खेलों के मैदान आदि में भी वह पुरूषों से पीछे नहीं हैं। एक तरफ वह बस चला रही हैं तो दूसरी तरफ रेलगाड़ी चला रही और विमान उड़ा रही हैं। अन्तरिक्ष तक नारी पहुंच चुकी हैं। संगीत का क्षेत्र, जहां पूर्व काल में पुरूषों का बोलबाला था, कुछ गिनी चुनी महिलायें ही इस विधा को अपनाती थीं, किन्तु आज के युग में संगीत के तीनों क्षेत्रों-गायन, वादन एवं नृत्य में महिलाओं ने देश का नाम विश्व पटल पर रोशन किया है। किन्तु यह सब करने में उसे कितने कष्ट झेलने पड़ते हैं? यह एक अत्यन्त दुःखद पहलू है। नारियों को भ्रूण-हत्या, भेद-भाव, दहेज, यौन-हिंसा, घरेलू-हिंसा आदि झेलना पड़ता है। बलात्कार रूपी दानव ने महिलाओं को बुरी तरह भयभीत किया हुआ है। घर से बाहर निकलना और अपने को सुरक्षित रखते हुये कुछ कर पाना स्त्रियों के लिये चुनौती साबित हो रहा है।संस्कार और आदर्श कहां खोते जा रहे हैं, इनको समाज में पुनः स्थापित करना अति आवश्यक है।इन समस्याओं से निपटने के लिये ही महिला सशक्तीकरण पर जोर दिया जा रहा है।महिला सशक्तिकरण का सीधा सा अर्थ है महिलाओं की योग्यताओं का विकास करना, जिससे वे अपने विकास से जुड़े सभी निर्णय ले सकें और अपने अधिकारों के प्रति सचेत रह सकें।समाज में नारी को उसके वास्तविक अधिकारों को प्राप्त करने में सक्षम बनाना ही महिला सशक्तीकरण का प्रमुख उद्देश्य है।

श्रीपादअमृतडांगे के अनुसार- ‘‘नारी को स्वाधीन बनाने और उसे पुरूष के बराबर बनाने का काम तब तक सफल नहीं होसकता, जब तक उसको निजी पारिवारिक परिश्रम की सीमाओं से बाहर निकालकर सामाजिक उत्पादन के परिश्रम में नहीं लगाया जाता।नारी तभी स्वाधीन हो सकती है जब वह सामाजिक उत्पादन में बड़ी संख्या में भाग लेने लगे और पारिवारिक श्रम में उसे कम से कम समय देना पड़े।’’

महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये हमें महिलाओं के प्रति अपनी सोच को विकसित करना होगा।हमारी सरकार द्वारा भी इस दिशा में कई कड़े कदम उठाये गये हैं, जिनमें से महिलाओं के प्रति दुव्र्यवहार, लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा, यौन-हिंसा? दहेज-हत्या एवंकन्याभ्रूण-हत्या आदि को रोकना आदि प्रमुख है।

अन्त में , महिलाओं को समर्पित चन्द पंक्तियाँंः

‘‘परिन्दे रूक मत, तुझ में जान बाकी है,
मंजिल दूर है, बहुत उड़ान बाकी है।
आज या कल, मुट्ठी में होगी दुनियाँ,
लक्ष्य पर अगर, तेरा ध्यान बाकी है।
यूं ही नहीं मिलती रब की मेहरबानियाँ
एक से बढ़कर एक इम्तहान बाकी है।
जिन्दगी की जंग में है हौसला जरूरी
जीतने के लिये सारा जहान बाकी है।।’’

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