कण्ठ-संरचना, साधना एवं चिकित्सा

सामान्यतया हम कण्ठ को गला अथवा गर्दन के रूप में जानते हैं। गायक सुरीला है अथवा कर्कश है, इत्यादि बातों के सम्बन्ध में हम गायक के गले को ही सम्बोधित करते हैं। किन्तु इन बातों का वास्तविक सम्बन्ध गले से नहीं अपितु कण्ठ से होता है।

कण्ठ-
कण्ठ गले में उपस्थित एक हड्डी को कहते हैं।अंग्रेजी में कण्ठ को थ्रोट कहते हैं। यह किसी भी जीव की आवाज़ को सन्तुलित करता है।

संरचना एवं क्रिया विधि-
यदि विज्ञान के अनुसार इसकी संरचना की बात करें तो हमारे गले में एक स्वर ग्रन्थि होती है, जिसको हम अंग्रेजी में Voice Box(वॉइस बॉक्स) अथवा Larynx(लैरिंक्स) कहकर भी सम्बोधित करते हैं। इस ग्रन्थि के अन्दर बहुत से स्वररज्जु होते हैं। जिनके कारण ध्वनि उत्पन्न होती है।इन स्वररज्जुओं को अंग्रेजी में Vocal Cords(वोकल कॉर्ड्स) अथवा Vocal Fold(वोकल फोल्ड) भी कहते हैं।

का भरपूर सहयोग मिलता है। यह माँसपेशियाँ ही बोलते अथवा गाते समय स्वररज्जुओं में खिंचाव पैदा करती है, जिसके कारण विभिन्न स्वरों में हम बोल पाते हैं।स्वररज्जुओं की विभिन्नता के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति महिला पुरुष अथवा बच्चे की आवाज में भिन्नता पाई जाती है। साधारणतया पुरुषों के स्वररज्जुओं की लम्बाई 20 मिमी० तथा महिला के स्वररज्जुओं की लम्बाई 15 मिमी० मीटर होती है।)



Muscles( में ग्रहण करते हैं वह एक सकरी दरार, जिसको हम अंग्रेजी मेंै सपज कहते हैं, के माध्यम से स्वररज्जुओं तक पहँुचती है। जिसके तेज बहाव के कारण स्वररज्जुओं अर्थात्टवबंस ब्वतके में कम्पन होता है, जो ध्वनि उत्पादन का प्रमुख कारण है।

स्वररज्जुओं को अपने पूरे क्रियान्वयन में माँसपेशियों )स्नदहे( को अपने फेफड़ों )Air(वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि ध्वनि ऊर्जा का ही एक रूप है। इसका उत्पादन हमारे शारीरिक कम्पन के माध्यम से होता है। श्वसन के माध्यम से हम जिस वायु

कण्ठ साधना-
ध्वनि का प्रत्येक श्रोता पर प्रभाव पड़ना उतना ही स्वाभाविक है, जितना पानी में पत्थर फेंकने पर मछली आदि जलीय जीवों में हलचल होना।किन्तु किसी भी व्यक्ति की आवाज़ का सामने वाले व्यक्ति के चेतन अथवा अवचेतन मस्तिष्क पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, यह उस व्यक्ति के कण्ठ की प्रकृति पर निर्भर करता है। न सिर्फ़ गायन अथवा सामान्य वार्तालाप में भी कण्ठ की प्रकृति का मधुर होना आवश्यक है।क्योंकि मधुर प्रकृति श्रोता के मन प रअच्छा प्रभाव डालकर आकर्षित करती है।

साधना शब्द से स्पष्ट है कि यह मुश्किल कार्य है। प्रायः देखा जाता है कि विद्यार्थी इस विषय पर ध्यान नहीं देते। वह केवल अधिक समय तक अभ्यास कैसे करें यह ध्यान में रखते हैं। किन्तु कण्ठ की प्रकृति कैसी है, अभ्यास से कण्ठ की प्रकृति मेंअपेक्षित सुधार आ रहा है अथवा नहीं? यह सभी अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय हैं। ध्यान देने की बात यह भी है कि गायन के अन्तर्गत कई विधाएं हैं जो एक दूसरे से पूर्णतः भिन्न हैं।जैसे अनगिनत आलाप तथा तान युक्त ख़्याल शैली, इसके विपरीत आलाप व तान रहित तथा लयकारी युक्त ध्रुवपद व धमार शैली। श्रृंगारिकता से ओत-प्रोत ठुमरी व इसके विपरीत करुण मानी जाने वाली ग़ज़ल विधा। जब इन सभी विधाओं की प्रकृति एक समान नहीं है तो सभी का अभ्यास एक समान कदापि नहीं हो सकता।

अतः विद्यार्थियों को चाहिए कि सर्वप्रथम अपनी रुचिको समझकर तथा कण्ठ की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अपने लिए उपयुक्त गायन विधा का चुनाव करें। गायक को अपनी पसन्दीदा गायन शैली की प्रकृति के अनुरूप ही स्वर अभ्यास करना चाहिए। गाय की में किस स्थान पर कितना गला खोलना है, शब्दों के कहने का ढंग कैसा हो इत्यादि की जानकारी आवश्यक है। गायकी में बल प्रयोग भी विधा के अनुरूप ही करना चाहिए ताकि गायन के साथ ही मधुरता भी सृजित होती रहे। इस प्रकार के अभ्यास के लिए अधिक एकाग्रता, समय व सावधानी की आवश्यकता होती है, अतः धैर्य व योग्य गुरु का होना अति आवश्यक है।

कण्ठ चिकित्सा-
प्रायः खान-पान व कण्ठ की सुरक्षा को लेकर विद्यार्थियों में जागरूकता का अभाव देखा जाता है। यदि कण्ठ सुरक्षा को ध्यान में रखकर खाद्य-पेय का सेवन किया जाए तो आधी चिकित्सा ऐसे ही हो जाएगी। प्रायः लोगों में यह धारणा पाई जाती है कि सब कुछ खाना चाहिए क्योंकि सब कुछ भगवान ने ही बनाया है, किन्तु यह भी विचार करने योग्य बात है कि भगवान ने सभी को गायन योग्य नहीं बनाया है। जिस प्रकार भगवान के बनाये सभी लोगों की भौतिकता, बौद्धिकता तथा प्रकृति में भिन्नता होती है,उसी प्रकार खाद्य पदार्थों में भी भिन्नता है।अतः गायक को कण्ठ
सुरक्षा का भाव रखते हुए अपनेउपयुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

कण्ठ सुरक्षा व चिकित्सा निम्न प्रकार से की जा सकती है-

  1. खट्टे खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
  2. क्ण्ठ को सूखने से बचाएं इसके लिए मिश्री का सेवन भी कर सकते हैं, पर अधिक नहीं। पानी पर्याप्त मात्रा में पिएं ताकि कण्ठ में तरलता बनी रहे।
  3. बहुत गर्म खाद्य व अधिक शीतल पेय कण्ठ को विकृत बना सकता है।

 सबसे आसान वह उपयुक्त उपाय है। कफ़ की समस्या हो तो गर्म पानी में सेंधा नमक का प्रयोग रामबाण सिद्ध होसकताहै।अधिक समस्या हो तो योग्य चिकित्सक से सम्पर्क कर परामर्श लेना चाहिए।)Gargle(आज के समय में खुले खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ गया है, जिस कारण बीमारियों में भी इजाफ़ा हुआ है। संक्रमण इत्यादि से बचने के लिए गरारा

Shiv Ruchi Singh

Ph.D. Scholar
Bhatkhande Music Deemed University
Mob.- 8090322536

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